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परसबाग : जहाँ फूल ही नहीं व्यक्तित्व भी खिलते हैं

  • Writer: Suman Sharma
    Suman Sharma
  • 2 hours ago
  • 5 min read

विद्यालय में शिक्षक होना मेरे लिए केवल पाठ्यपुस्तक के अध्याय पूरे करना नहीं था। मेरे सामने हर दिन अलग-अलग स्वभाव, क्षमताओं और परिस्थितियों वाले बच्चे आते थे। कोई पढ़ाई में बहुत तेज था, कोई बार-बार समझाने पर भी पीछे रह जाता था। कोई दिव्यांगता के कारण सामान्य गतिविधियों में सहजता से भाग नहीं ले पाता था, तो कोई अपनी रुचि के कारण मुख्य विषयों से हटकर कोई वैकल्पिक विषय चुन लेता था।

और कुछ बच्चे ऐसे भी थे, जिनकी ऊर्जा कक्षा में अनुशासनहीनता के रूप में दिखाई देती थी।

कई बार मैं स्वयं सोचती—

“क्या हर समस्या का समाधान केवल कक्षा की चारदीवारी के भीतर ही संभव है?”

इसी समय मेरी गाइड्स को कीचन गार्डन बैज के लिए अपना प्रकल्प पूरा करना बेहद चुनौतीपूर्ण लगने लगा । उन्होंने समझ लिया था बागवानी करना इतना भी सरल नहीं है । मार्गदर्शन व विकल्प की तलाश में जब लड़कियाँ मेरे पास आईं , मैंने उन्हें माइक्रोग्रीन ग्रो करना सिखाया । माइक्रोग्रीन से प्राप्त पोषक तत्वों की समझ ने उनका नाता मेरे परसबाग के स्वपन से जोड़ दिया ।

हम सभी विद्यालय के परसबाग तक पहुँच गए। .

शुरुआत में परसबाग मेरे लिए विद्यालय का एक छोटा-सा हरा कोना था। वहाँ मिट्टी थी, कुछ पौधे थे और कुछ खाली क्यारियाँ। लेकिन धीरे-धीरे मुझे लगा कि यह मिट्टी केवल पौधों को नहीं, मनुष्यों को भी सँवार सकती है।

मैंने तय किया—

“क्यों न परसबाग को बच्चों के सीखने और जीवन-मूल्यों को विकसित करने की प्रयोगशाला बनाया जाए?”

सबसे पहले मैंने उन विद्यार्थियों को परसबाग की गतिविधियों से जोड़ा, जिन्हें हम सामान्यतः स्लो लर्नर कह देते हैं। कक्षा में जो बच्चा गणित के सवाल को समझने में समय लेता था, वही पौधे में नई कोंपल देखकर तुरंत पहचान लेता था कि पौधा बढ़ रहा है।

मैंने उसे समझाया—

“देखो, पौधे को भी बड़ा होने में समय लगता है। हम उसे रोज खींचकर बड़ा नहीं करते। बस मिट्टी, पानी, धूप और देखभाल देते हैं। तुम भी ऐसे ही हो। तुम्हें थोड़ा अधिक समय चाहिए, इसका अर्थ यह नहीं कि तुम कम हो।”

उस दिन उस बच्चे की आँखों में जो आत्मविश्वास मैंने देखा, वह किसी परीक्षा के अच्छे अंक से कहीं अधिक मूल्यवान था।

फिर मेरी नजर उन दिव्यांग विद्यार्थियों पर गई, जिन्हें कई गतिविधियों में भाग लेने में कठिनाई होती थी। मैंने परसबाग की कुछ गतिविधियों को उनकी सुविधा के अनुसार व्यवस्थित किया। किसी को बीज छाँटने का काम दिया, किसी को पौधों के नाम लिखने का, किसी को पानी देने की जिम्मेदारी दी।

मुझे महसूस हुआ कि समावेशन का अर्थ केवल बच्चे को साथ बैठाना नहीं, बल्कि उसे यह एहसास कराना है कि उसकी भी आवश्यकता है, उसकी भी भूमिका है।

एक दिन एक विद्यार्थी ने कहा—

“मैडम, आज पौधों को पानी देने की जिम्मेदारी मेरी है ना?”

मैंने मुस्कुराकर कहा—

“हाँ, क्योंकि मुझे तुम पर विश्वास है।”

शायद उस बच्चे के लिए वह केवल एक जिम्मेदारी नहीं थी; वह विश्वास का पहला अनुभव था।

परसबाग ने मुझे उन विद्यार्थियों के करीब भी पहुँचाया, जिन्होंने मुख्य विषयों से हटकर वैकल्पिक विषय चुने थे। पहले मुझे लगता था कि शायद वे मुख्य शैक्षणिक धारा से दूर जा रहे हैं। लेकिन पौधों के बीच काम करते हुए मैंने समझा कि हर बच्चे की प्रतिभा का रास्ता अलग हो सकता है।

किसी को विज्ञान की किताबों में रुचि थी, किसी को चित्रकारी में, किसी को प्रकृति में, तो किसी को हाथों से काम करने में।

मैंने स्वयं से कहा—

“बच्चे को अपनी पसंद के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर देना भी शिक्षा का ही हिस्सा है।”

धीरे-धीरे परसबाग में एक और परिवर्तन दिखाई देने लगा।

जो बच्चे कक्षा में बार-बार शोर करते थे, वही परसबाग में पौधों की देखभाल करते समय शांत रहने लगे। मैंने उन्हें समझाया—

“यदि तुम पौधे को पानी देते समय उसकी जड़ों को नुकसान पहुँचाओगे, तो वह तुम्हें कुछ नहीं कहेगा। लेकिन कुछ दिनों बाद उसका परिणाम दिखाई देगा। हमारे व्यवहार का भी ऐसा ही है। हम जैसा व्यवहार करते हैं, वैसा ही वातावरण हमारे आसपास बनता है।”

मैंने उन्हें नियम थोपने के बजाय जिम्मेदारियाँ बाँटना शुरू किया।

किसी को पानी की जिम्मेदारी, किसी को खरपतवार हटाने की, किसी को पौधों की वृद्धि लिखने की, किसी को स्वच्छता की।

धीरे-धीरे बाहरी अनुशासन स्वअनुशासन में बदलने लगा।

अब बच्चे स्वयं कहते—

“मैडम, आज मेरी ड्यूटी है।”

“मैडम, इस पौधे को पानी चाहिए।”

“मैडम, हमने क्यारी साफ कर दी।”

मुझे लगा जैसे परसबाग में केवल पौधे नहीं, जिम्मेदारी की भावना भी अंकुरित हो रही थी।

एक दिन मैंने बच्चों से पूछा—

“परसबाग हमें क्या सिखाता है?”

एक बच्चे ने कहा—

“नियमितता।”

दूसरे ने कहा—

“धैर्य।”

तीसरे ने कहा—

“मेहनत।”

और पीछे से एक आवाज आई—

“मैडम, तनाव हो तो पौधों के पास बैठना चाहिए!”

मैं मुस्कुरा दी।

सचमुच, परसबाग मेरे लिए भी तनाव-मुक्ति का स्थान बन गया था।

कक्षा की भागदौड़, प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ, विद्यार्थियों की समस्याएँ और रोजमर्रा की चुनौतियाँ—इन सबके बीच कुछ क्षण मिट्टी को छूना, पौधों को देखना और उनकी वृद्धि को महसूस करना मुझे भीतर से शांत करता था।

मैंने बच्चों को समझाया—

“पौधा हमें सिखाता है कि विकास धीरे-धीरे होता है। बीज बोने के बाद तुरंत फल की अपेक्षा नहीं की जाती। जीवन में भी धैर्य रखना पड़ता है।”

इसी तरह परसबाग ने हमें नियमितता, धैर्य, अनुशासन, श्रम-निष्ठा, सहयोग, जिम्मेदारी और तनाव-मुक्ति जैसे जीवन-मूल्यों का व्यावहारिक पाठ पढ़ाया।

कुछ महीनों बाद जब मैंने पीछे मुड़कर देखा, तो मुझे लगा कि सबसे बड़ा परिवर्तन क्यारियों में नहीं, बच्चों के व्यवहार में हुआ था।

जो बच्चा पहले कहता था—

“मैं नहीं कर सकता।”

वह अब कहता था—

“मैडम, मैं कोशिश करूँगा।”

जो बच्चा नियमों से बचता था, वह अब दूसरों को नियम समझाता था।

जो बच्चा अपनी कमजोरी को लेकर चुप रहता था, वह अब अपनी छोटी-सी सफलता पर गर्व करता था।

और तब मुझे एहसास हुआ—

शिक्षा केवल किताबों में नहीं होती।

कभी-कभी एक बीज भी शिक्षक बन जाता है।

एक पौधा धैर्य सिखाता है।

मिट्टी श्रम का सम्मान सिखाती है।

और परसबाग जीवन जीने की कला सिखा देता है।

आज जब मैं विद्यालय के परसबाग में खड़ी होकर हरी-भरी क्यारियों को देखती हूँ, तो मुझे केवल सब्जियाँ और पौधे दिखाई नहीं देते।

मुझे उनमें अपने विद्यार्थी दिखाई देते हैं।

कोई अभी बीज है, कोई अंकुर है, कोई पौधा बन चुका है और कोई फल देने की तैयारी में है।

और मैं?

मैं स्वयं को उस माली की तरह महसूस करती हूँ, जिसका काम पौधे को अपनी इच्छा के अनुसार बनाना नहीं, बल्कि उसकी अपनी क्षमता को पहचानकर उसे सही वातावरण देना है।

तभी मुझे अपने शिक्षक होने का असली अर्थ समझ में आता है—

“बच्चों को बदलना नहीं, उन्हें खिलने का अवसर देना है।”

और मेरे लिए विद्यालय का परसबाग अब केवल एक बगीचा नहीं है।

यह मेरी खुली कक्षा है,

मेरी प्रयोगशाला है,

मेरे विद्यार्थियों का आत्मविश्वास केंद्र है

और मेरे लिए तनाव-मुक्ति का शांत आश्रम है।

जहाँ हर दिन मिट्टी में बीज बोए जाते हैं और उसी के साथ

विश्वास, अनुशासन, धैर्य और जीवन-मूल्यों के बीज भी बोए जाते हैं।

सुमन संदेश शर्मा





 
 
 

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