
पचमढ़ी तक की यात्रा
- Suman Sharma
- 2 days ago
- 15 min read
एक ही चक्कर घिन्नी में घूमते घूमते सहसा जब पचमढ़ी जाने का सुयोग बना तब तक पचमढी के बारे में इतना ही ज्ञात था कि पचमढ़ी प्राकृतिक रम्य स्थलों में से एक भारत के मध्यप्रदेश में स्थित खूबसूरत प्रदेश है और यहीं भारत स्काउट गाइड का राष्ट्रीय प्रशिक्षण केंद्र भी है । स्काउट गाइड के स्थानीय व राज्य प्रशिक्षण केंद से आगे राष्ट्रीय प्रशिक्षण केंद्र तक जाने का यह मेरा पहला अनुभव था । प्रशिक्षण की सूचना मिलते ही मेरी साथी मंजू ने रेल्वे टिकट आरक्षित करवा लिया। हम रिपोर्टिंग टाइम से घंटे भर पहले पहुंचने की योजना के साथ अपने यात्रा का नियोजन कर रहे थे । ट्रेनिंग के अंतिम दिन डिर्पाचर टाइम ,लंच के बाद का था अतः उसी दिन रात 10 बजे की वापसी की ट्रेन थी , हम शिविर नियमों से भी भली भॉति परिचित थे , जानते थे कि प्रशिक्षण के दौरान एनसीटी का दौरा या आस पास के किसी एक क्षेत्र के पैदल हाइक के अवसर से ज्यादा घूमने का अवसर हमे नहीं मिलने वाला था, इससे ज्यादा की हमें चाहत भी नहीं थी क्योंकि हमारा उद्देश्य भी प्रशिक्षण संपूर्ति ही था ।
मेरी सहेली मंजू इस यात्रा को लेकर जितनी सजग व तैयार थी मैं उतनी ही लापरवाह । मंजू ने रेल के सफर को सुविधा जनक बनाने हेतु रेल यात्री एप डाउनलोड कर लिया था , पिपरिया से स्टेशन पर उतरने के बाद की यात्रा का समय , वहाँ से मिलने वाले परिवहन साधन सब कुछ का पता पहले ही कर लिया था । दूसरी यात्राओं में अपने पति की पिछलग्गू बन कर जाने से भिन्न इस यात्रा की तैयारी में यात्रा के लिए अपने साथ ले जाने वाले सामान की पैंकिग के पहले मानसिक बैग में साहस , सजगता , आत्मविश्वास को भी सबसे पहले रखना था यद्यपि प्रशिक्षण के लिए मैंने पहले भी एकल यात्राएँ की थी ,किंतु यह थोड़ा भिन्न था । गर्म कपड़े स्लीपिंग बैग , कैंप में लगने वाले सभी सामान के साथ मेरा लगेज तैयार हुआ और मैं पहुँच गई स्टेशन । सामान जितना कम हो , सफर उतना आसान होता है , किंतु हम मुंबई के सौम्य जलवायु से पचमढ़ी जा रहे थे जहाँ तापमान दस अंश तक संभावित था । गर्म कपड़ो ने बैग को थोड़ा सा भारी कर दिया था । आभास हुआ लगेज़ अकेले उठाने में दिक्कत आ सकती है , लेकिन मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनस पर ही मुझे इसका समाधान भी नज़र आ गया , वहाँ अनेक कारीगर घूम रहे थे जो तुरंत बैग पैक या साधारण बडे हैंड बैग में पहिया जोड़ कर उसे रोलिंग बैग में बदल सकते थे , मेरा मन भी ललचा उठा ,अपने बैग के रूप को बदलने के लिए , लेकिन मन को तुरंत समझा दिया , फिलहाल मुझे जरूरत नहीं । इस यात्रा के दौरान अतिरिक्त खरीदारी को टालने हेतु सामान की जरूरत और चाहत के अंतर को हर वक्त याद रखने का निश्चय मैंने किया था ।
लोकमान्य टर्मिनस पर13202 राजगिर एक्सप्रेस नियत समय पर खड़ी मिली । ट्रेन में सवार होते ही अपने बैग्स को यथास्थान एडजस्ट करना , अपनी सीट का मुआयना करना जैसी छोटे छोटे काम सहजता से पूरे हो गए जो सुहाने सफर के लिए जरूरी थे , फिर दरवाजे पर खड़े होकर फोटो खिंचवाने से हम कैसे चुकते । पतिदेव स्टेशन तक आए थे , हैपी जर्नी की शुभकामना के साथ हमारी ट्रेन चल पड़ी ।
राजगिर एक्सप्रेस तीन राज्यों महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और बिहार को जोड़ती है । राजगिर एक्सप्रेस ! राजगिर यह राजगृह का अपभ्रंश है । मगध साम्राज्य की पहली राजधानी (राजगृह ) जो राजगिर बन गया था । रेलगाड़ी अपनी पटरी पर दौड़ने लगी और हमारी दौड़भाग को विराम लगा । रेल की लंबी यात्रा के इस सुकून का मुझे न जाने कब से इंतजार था । अहा ! घंटों गपशप करने के बाद भी खुद के साथ रहने का पर्याप्त समय । मेरा मन गाने लगा था , "कस्तो मजा है रेल मा , रमाइलो उकली ओराली। "मुंबई से आठ सौ तीन किलोमीटर की रेल यात्रा के बाद सुबह 4: 50 को हम पिपरिया स्टेशन पहुँच गए। हमारे साथ हमारे ओवरकोट और स्वेटर भी तैयार थे ,ठंडी व सर्द हवाओं से मिलने को । हम मुंबईकरों के लिए गर्म कपड़े पहनना का मौका,एक मौका होता है क्योंकि ऐसे मौके मुंबई की जलवायु तो हमें कम ही देती है।पिपरिया स्टेशन पर जहाँ तक नज़र गई , इस ट्रेन से उतरने वाले हम दोनों ही दिख रहे थे, हाँ दूसरे प्लेटफार्म के रैम्प से अपने रोलिंग सुटकेस को घसीटते एक महिला मूर्ति दिखी ,हम समझ गए इनका गंतव्य भी एनसीटी है,ये थीं रेखा भदौरिया अपने सूटकेस को घसीटते संभालते व चलते चलते ही हल्के फुल्के औपचारिक संवाद करते हम स्टेशन परिसर से बाहर निकले । बाहर था घुप्प अंधकार ! स्टेशन परिसर के बाहर बाहर निकलते ही पचमढ़ी के लिए टेक्सी मिल गई , हमारी टैक्सी व हमारी नई दोस्त रेखा से बातचीत के सिलसिले में गति आ गई । हरे भरे रम्य जंगल के बीच घुमावदार घाटियों से गुजरते हुए अंधेरा भी छटने लगा था । सूरज की किरणों के प्रकाश में पचमढ़ी की सुरम्य वादियों के दीदार ने आँखों को तृप्त करना शुरू ही किया था कि भौगोलिक भिन्नता अर्थात ऊँचाई व घुमावदार रास्ते ने प्रभाव दिखाना शुरू किया।उल्टी -मतली से बचने के लिए दवा खाने के बावजूद टैक्सी को कुछ पलों के लिए किनारे पर लगाना पड़ा । मन हरे-भरे रम्य प्राकृतिक सौंदर्य का आस्वाद ठहर कर लेने को आकुल था , लेकिन हमें समय पर रिपोर्ट करना था , कहीं ठहरने का तो सवाल ही नहीं था। पिपरिया से पचमढ़ी के लगभग 55 किलो मीटर की दूरी तय करने में ही रेखा भदौरिया अभिन्न मित्र बन गईं , रेखा भदौरिया के आकर्षक , जिंदादिल व्यक्तित्व का साथ किसी भी पल को उत्सव में बदलने के लिए पर्याप्त था । मैं रायगढ़ ( महाराष्ट् ) की सोनाली को याद करने लगी,काश ! वह भी साथ होती । घंटे भर बाद ही हमें देश भर के अन्य प्रशिक्षणार्थी उम्मीदवारो से मिलना था ।
एनसीटी परिसर में प्रवेश करते ही मुख्य द्वार पर दिखा वह स्मारक जिसमें भारत स्काउट गाइड का प्रतीक चिह्न व उसके नीचे लिखे थे कुछ वाक्यांश । ध्येय वाक्य, कोशिश करो, सदा तैयार रहो और सेवा। शिशु से किशोरवयीन बच्चों को चरित्र निर्माण व जीवन कौशल्य सिखानेवाला एकअनूठा अभ्यासक्रम है स्काउट गाइड आंदोलन में । आप स्काउट गाइड आंदोलन से परिचित होना चाहते हैं तो बता दूँ इसके द्वार सभी लोगो के लिए खुले हैं । विश्व व्यापी इस आदोलन में एक बार जो सदस्य बनता है वह आजीवन इस मूवमेंट का सदस्य होता है और वयानुसार गतिविधि में शिशुओं हेतु अर्थात तीन और चार साल से शुरू होने वाले पाठ्यक्रम में लड़के लड़कियाँ स्किवरल , बनी - टमटोला, कब -बुलबुल , स्काउट गाइड और रोवर - रेंजर के रूप में कार्य करते हैं ।
इसमें बनी - टमटोला का ध्येय मुस्कुराते रहो ,कोशिश करो - कब्स और बुलबुल का ध्येय , तैयार रहो यह ध्येय स्काउट्स व गाइड्स का तथा रोवर रेंजर का ध्येय सेवा होता है।
परिसर में प्रवेश करते ही सुव्यवस्थित युनिफार्न , अनुशासन व गंभीरता मिश्रित मुस्कान से हमारा स्वागत किया ,डेप्युटी डिरेक्टर गाइड कुमुद मेहरा जी ने जो इस कोर्स की लीडर थीं । पूरे प्रशिक्षण के दौरान, पूरे शिविर परिसर पर उनकी पैनी निरीक्षक नज़रे व उनके व्यक्तित्व व वक्तव्य का जादुई प्रभाव रहा । उनके साथ प्रशिक्षिकाओं की टीम तैनात थी , आदरणीया प्रेमा थापा जी मिसेज निरूपमा बाजपेयी , मिसेज भावना और मिसेज सविता जी ।
कैंप टूर से यह आभास हुआ कि प्रकृति के बड़े अनूठे रम्य स्थल पर हमारा निवास है । इस रम्य स्थली की सैर कतार बद्ध होकर ,सड़क के किनारे चलते चलते हम कभी सेल्फी लेते , कभी फोटो खींचते निहारते आगे बढ़ते रहे । दल में पच्चीस से पचपन (पचपन से अधिक उम्र वाले भी ) की उम्र वाले सभी इस समय बच्चे थे , जिनकी चिंता हमारे ट्रेनर बिल्कुल वैसे ही रहे थे जैसे हम अपने दस से सत्रह वर्ष के गाइड्स की चिंता करते थे । पचपन में बचपन का निर्मल आनंद मिल सके ऐसा वातावरण पचमढ़ी की इन वादियो और इस शिविर क्षेत्र में है , इसी क्षेत्र में है BSG का एंडवेचर एरिया , किरोडीमल हॉल और भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के कर कमलों द्वारा श 10 सितंबर 1956 को जिस भवन का शिलान्यास हुआ था वह भवन , लार्ड बेडेन पॉवेल स्मारक गाइड भवन । यहीं है स्काउट गाइड नियमों की सीढ़ियों से स्वागत करता प्रशासनिक भवन भी ।
टेन्ट , कंबल , चादर इत्यादि हमें रिपोटिंग के साथ ही ॲलाट हो गए थे , हम भी युनिफार्म में सजधज कर तैयार हो गए सात दिनों तक एक अनूठे अनुभव के लिए । इस सुखद अनुभवों में तमिलनाडू , गुजरात , उत्तर प्रदेश , बिहार , मध्य प्रदेश , आसाम , पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की मिट्टी और भाषा का जादू था । भाषा से परे जहाँ भाव कभी ज्यादा मुखर होकर बोलता था तो कभी एक मुस्कान ही अनेक शब्दों की समानार्थी बन जाती । इन सात दिनों में गजानन माधव मुक्तिबोध की रचना 'जन जन का चेहरा एक ' बार बार याद आया। देश भर से हम इकतालिस प्रशिक्षणार्थी जो लीडर ट्रेनर बनने वाले थे , इस प्रशिक्षण शिविर में पाठ्यक्रम और लीडर्स को प्रशिक्षण कैसे देना है यहीं नहीं सीख रहे थे , हम साक्षी बन रहे थे भारत की राष्ट्रीय एकात्मकता के सौंदर्य व शक्ति के । ग्रूप डायनामिक की कार्यप्रणाली को महसूस करने के लिए स्काउट गाइड की पेट्रोल प्रणाली से बढ़िया कुछ नहीं हो सकता । मैंने अपनी तमिळ सहपाठियों से तमिळ वाक्य सिखा , " नान उन्नै कादलिक्किरेन ।''अर्थात मैं तुमसे प्यार करती हूँ , आज उन सबसे कहती हूँ कि मैं भारत की संस्कृति से प्यार करती हूँ -नान इंदियाविन कलाच्चारत्तै कादलिक्किरेन ।
क्या आपको लगता है कि राष्ट्रीयता व प्रादेशिकता के बीच की आभासी या भाषाई दीवार को गिरा कर राष्ट्र ही सर्वोपरि की भावना को बलवान बनाने वाले अदृश्य भावों का जन्म कभी कभी सिनेमा के हिंदी गीत से भी हो सकता है ? ज़ी हाँ ! मैंने देखा । गीत - संगीत की उस भाषा को जो भाषाई सीमा को बड़ी सुंदरता से लाँघकर एक सेतु बनाते हैं क्योंकि जन जन का चेहरा एक होता है ।
इस राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में प्रतिदिन सुबह 6:30 से रात के 10 बजे तक का कार्यक्रम तय था , उसके बाद हम अपना निजि कार्य व अपने दल ( पेट्रोल ) के साथ किए जाने वाले काम करते। बाँस की लाठियों से कुर्सी मेज , बहुउद्देशीय गॅजट बनाते, गाते गुनगुनाते देर रात सोते,और सुबह साढ़े पाँच बजे - उठ जाग मुसाफिर भोर हुई , अब रैन कहाँ जो सोवत है के घोष की ड्यूटी बजाते जागते व जगाते। यहाँ दल के प्रत्येक सदस्य की एक साथ रिपोर्टिंग व एक दूसरे की वर्दी की बारीकियों को सही करने की भागा दौड़ी का अपना आनंद था । हर टास्क कंपलीट करने के प्रेशर में अक्सर हम ठहाके लगाते कहते ,अरे यार ! इतनी मेहनत सही समय पर कर लेते तो शायद आई पी एस ही क्लीयर हो जाता । आई पी एस की उपलब्धि का तो पता नहीं लेकिन थका देने वाली दिनचर्या में से कुछ मिनटों के कैम्प फायर में हँसते हँसते लोट पोट होने और गाइड ओन की प्रार्थना में पल भर शांति की अनुभूति भी कोई कम उपलब्धि कहाँ !
अलग अलग प्रदेश के लोगों का शरीर गर्मी- ठंडी के प्रति अलग अनुकूलन (Adaptation)क्षमता रखता है । हमारे तमिळ फ्रेंड्स ठंडी से परेशान थे । मैं भी थर्मल वियर , दो - दो स्वेटर , कानों में रुई ठूसे , स्लीपिंग बैग में घूस कर अच्छी नींद लेने की कोशिश में दो दिन तक नाकाम रही थी । आखिरकार तीसरे दिन अपने स्लीपिंग बैग के भीतर दोनों ओर कंबल को ठीक ठाक एडजस्ट कर नींद लेने में सफलता मिली । हमारा रैन बसेरा तंबू था , वह तंबू जिसमें रात में तो हम रहते ,दिन में जब डीजिटल रूम में हमारे लेक्चर होते तो कई बार उसमें वानर सेना कवायत करती । टेन्ट में घुसकर इस वानर सेना द्वारा बैग खोलकर कपड़ो को तितर बितर करना ,नल को खोलना व खुला छोड़ देना , उनका खेलना .घूमना व खाने के समय मेस के आस पास घूमते वानर सेना को देखना हमारे लिए साधारण सी बात हो गई । वानर सेना से भी मानो दोस्ती हो गई थी , मुझे हम इंसानों की तरह बंदरों के व्यवहार भिन्नता का निरीक्षण करना अच्छा लगता ।अलग अलग उम्र के बंदर ! हमारे शैक्षणिक साधनों में से उठाए बॉल से खेलते , चाय या कॉफि मॅग को हाथ में लेकर उछलते कूदते शिशु वानर तो कभी मेस के जालीदार दीवारों से गुर्राते गुस्सैल प्रौढ़ वानरों की फौज के दर्शन एनटीसी परिसर में होते ही रहते । एक दोपहरी तो लगभग बीस से पच्चीस वानरों का दल पिकनिक मनाने हमारे रैन बसेरो में आ धमका । मैं ने एक बार पास पड़े पेड़ो की टहनियाँ उठा , काफी दूरी से आवाज लगाते हुए उन्हें वहाँ से हटाने का असफल प्रयास किया । मैंने सोचा रेखा भदौरिया भी इस काम में मेरी मदद करेंगी जैसा कि उनका स्वभाव है किंतु रेखा तो निर्विकार भाव से वहाँ से फोन पर बात करती आगे बढ़ गई और मैं ? फिर मैं भी मेस में भोजन करते मित्रों तक सूचना पहुँचाने के बाद मोबाइल निकाल वानर दल का विडियो बनाने लगी , कपिदल के एस टी ए में बिना कोई खलल व कोई व्यवधान डाले । भई , बड़ी मुश्किल से मिलते थे, दोपहर के बाद के यह पल ! जिसे हम कहते तो थे एस टी ए , स्पेयर टाइम एक्टीवीटी लेकिन जिसमे हम दौड़ते भागते लगे रहते टेस्ट पूरा करने में ।
खैर , वानरदल पिकनिक मना कर लौट गए थे , जेसे इनकम टैक्स की रेड पड़ी हो वैसे हमारे सामान बिखरे पड़े थे। मंजू बड़ी खुश थी , कपि महाराज ने उसके सामान में से दही के डिब्बे को चाट चाट कर खाया जो था । इस घटना के बाद हमारे सबके सामान पक्के कमरों में शिफ्ट हो गए ।
धूपगढ़,जटाशंकर जैसे नामों से पेट्रोल (दल )की पहचान अपने वर्दी पर लगाए हममें में से कई लोग पचमढ़ी परिसर के इन प्रसिद्ध स्थलों से बिल्कुल अनभिज्ञ थे । आखिरकार सतपुडा पर्वत श्रृंखला की इस सुंदर पहाड़ी ,सतपुड़ा की रानी की एक झलक पाने का अवसर मिला । एन टी सी परिसर के पास ही सूर्य नमस्कार पार्क / गार्डन जिसे योग स्थल कहा जाता है , हम पहुँच गए । रम्य व हरे-भरे इस सुंदर पार्क में सूर्य नमस्कार के 12 चरणों की सुंदर मानव मुर्तियाँ और अलग अलग दबाव के एक्युप्रेशर फुट पाथ न केवल इस क्षेत्र को आकर्षक बनाते हैं बल्कि संपूर्ण योग स्थली व फिटनेस स्पेस के रूप में परिभाषित करते हैं । योग व ध्यान में रुचि रखनेवालों के लिए यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं । हम सबने वहाँ सूर्य नमस्कार किया । हम प्रणामासन की मुद्रा में आए ही थे कि असिस्टेंट कंपनी लीडर कविता जी ने मंत्रोच्चारण के साथ सूर्य नमस्कार करवाना शुरू कर दिया । भानूदय की बेला और भगवान भास्कर के भिन्न भिन्न नामों के उच्चारण के साथ बारह आसन मानो बारह घंटों के लिए सूर्य के तेज व ऊर्जा को हमारे शरीर मन व मस्तिष्क में संचारित करने का काम कर रहे थे । इन अनुभवों को हृदय में और तस्वीरों को अपने मोबाइल कैमरो में सुरक्षित करते हम लौट पड़े अपने शिविर में ।
विडंबना तंबू में रैन बसेरा था , बाँस की लाठियाँ के गॅजट बन रहे थे लेकिन मोबाइल खराब होने पर लगता था दुनिया रुक सी गई है । मेरा मोबाइल बीच बीच में बंद पड़ जाता ,चार्ज नहीं हो रहा था , और हमारे कुछ टेस्ट , नोट्स , रिफ्लेक्शन , रिपोर्ट सबके लिए मोबाइल बहुत जरूरी। मैं परेशान सी अलग अलग प्लगों से , पावर बैंक से मोबाइल चार्ज करने की कोशिश करती रही । डॉ जाकिर हुसैन की कहानी याद आई, ‘उसी से ठंडा , उसी से गरम ।’ इस बालिश्तये की तरह मैं भी हैरान थी । मैंने हैरानी और परेशानी दोनों को व्यक्त नहीं किया लेकिन दोनों का समाधान मिला हमारी लीडर ऑफ द कोर्स आदरणीया कुमुद मेहरा जी से ।
जितने प्रभावी ढंग से वे प्रत्यक्ष रूप से विषय वस्तु पहुँचाती , उतना ही प्रभाव उनके अप्रत्यक्ष धीर - गंभीर व्यक्तित्व व बॉडी लैंग्वेज का भी था ।उनसे एक गीत सुना था -
एक से दो भले , दो से भले चार ,
मंजिल अपनी दूर है रास्ता करना पार ।"
स्काउटिंग गाइडिंग में एक परंपरागत पद्धति के साथ डिजिटल प्रणाली के संमातर प्रयोग की आवश्यकता का महत्व सहसा समझ में आ गया , मेरी उस समय के हैरानी भरे अपूछे प्रश्न का उत्तर मिल गया । आभार , हृदय से सभी गुरुजनों का आभार !
जीवन की हर साँस कहे बस एक तराना,
जो मिला, जो सिखा गया , सबका है शुक्राना । "
प्रशिक्षण का अंतिम दिन, नीले झंडे तले सभी विधिवत एक दूसरे से हाथ मिलाते हुए समापन की ओर बढ़े। कोल्हापुर की कविता हो या बिहार की बंटी , गुजरात की सुहाना , तमिळनाडू की तमिळरासी, शीबा , लता या सेवानिवृत्त रेम्मी । अपने अपने क्षेत्र के सभी धुरंधरो की आँखे नम थी , फिर मिलने का , मिलते रहने के वादों का बाद में क्या हश्र होने वाला था नहीं पता ,पर उस पल में वे वादे भावनाओं की इंद्रधनुषी पताकाएँ थीं । प्रशिक्षण शिविर से कार्यमुक्ति का प्रमाणपत्र मिल गया । वापसी की ट्रेन रात दस बजे की थी लेकिन सात बजे तक हमें पिपरिया पहुँचना ही था ,पचमढ़ी दर्शन करते हुए स्टेशन पहुँचने की योजना बनी । सेवेन सीटर कार का इंतजाम हुआ ,वापसी की यात्रा में हम तीनों , मैं मंजू और रेखा के साथ महाराष्ट्र के तीन और साथी जुड़ गए रायगढ़ की सोनाली व यवतमाळ की नंदा व नमिता । प्रशिक्षण केंद्र से बाहर गार्डन पहुँचे ,जहाँ स्थानीय फलों भिन्न प्रकार के बेरीज के स्टॉल के अलावा घुड़सवारी और पारंपरिक परिधानों को किराए पर लेकर फोटो खींचवाने की व्यवस्था थी । पारंपरिक परिधान के लिए मेरी इच्छा देख मंजू ने भी साथ दिया , झटपट पारंपरिक परिधानों को पहन हम फोटोशूट के लिए तैयार हो गए । गार्डन की सुंदरता का बैक ग्राऊंड , घेरदार लहंगा और भारी भरकम ऑक्साइड जूलरी में हम ! फोटो खिंचवाने में हमने कोई कसर नहीं छोड़ी। नंदा और नमिता सब कुछ कवर कर लेना चाहते थे , इसलिए उन्हें कहीं भी ज्यादा रुकना नागवार गुजरता । सोनाली और रेखा पल- पल में शानदार सेल्फी और रील से अपने यादों का खज़ाना भरते चलते । मैं और मंजू चाहते थे जहाँ भी पहुँचे , ठहराव के साथ उन जगहों और पलों को जी सके इसलिए हम दोनों के पास है वह ट्रेडिशनल ड्रेस में हमारी प्यारी सी तस्वीर । नंदा व नमिता के झुंझलाहट को देख हमें लगा हम तमाशा फिल्म में दीपिका पादुकोण वाले स्टाइल में उनसे कह ही दे, “कितनी भी कोशिश करो बन्नी , कुछ न कुछ तो छूटेगा ही।”
गार्डन से निकल कर हम पहुंचे पांडव गुफा । सतपुडा रेंज के राजेन्द्रगिरि पर्वत का यह ऊँचा भाग मानो विश्वकर्माजी ने स्वयं तराशा हो । घने हरे भरे वनों से आच्छादित इस पर्वत की सुंदरता मन मोह लेती है। मैंने कोशिश की कि यहाँ पहाड़ी की तलहटी से पहाड़ी के समग्र भाग को देख सँकू और फिर ऊँचाई से नीचे का मनोहारी दृश्य को । तपस्वियों सी अटल पर्वत चोटियाँ मानों धैर्य, साहस व संयम का पाठ पढ़ा रही हो , ऐसी ही खूबसूरत वादियों को देखकर ही भरत व्यास जी ने , ‘ये कौन चित्रकार है ?’ गीत की रचना की होगी । ये पहाड़ जो चुनौती देते हैं, जो साहस के जनक होते हैं जो मूक रहकर मानो संदेश देते है कि ऊँचाई तक पहुँचना हो तो मन व भावनाओं को इन पत्थरों की भॉति मजबूत बनाना होगा । यहाँ पहाड़ी के ऊँचे भाग तक पहुँचने का सीढीनुमा प्राकृतिक मार्ग पर्यटकों के लिए राहत देने वाला है । कहते हैं इसी स्थान पर पांडवों ने अज्ञातवास बिताया था , इन्हीं पाँच गुफाओं में उनके निवास के कारण यह स्थान पचमढ़ी के रूप में पहचाना जाता है। पाँच गुफाओं मे से चार आमने -सामने तो पाँचवा थोड़ा सा अलग दिख पड़ता है। एक गुफा में थोड़ा सा भीतर जाकर हम वापस निकल पड़े , अगले पड़ाव की ओर ।
. . हाँडी खोह , हाँडी के आकार की एक गहरी खाई जो लगभग 300 फीट से भी अधिक गहरी है , रास्ते में पड़ने के कारण ड्राईवर भाई हमें इस पाइंट पर ले आए । व्ह्यू पाइंट से इस पाइंट की एक झलक देखकर हम झट पट वहाँ से निकल पड़े । प्राकृतिक अजूबे इस हाँडी खोह के बारे में अनेक लोककथाएँ प्रचलचित है ।
. मै पिछले सात दिनों तक धूपगढ़ पेट्रोल से पहचानी जा रही थी । मन में विचार आया ,काश ! इस पॉइंट तक पहुँच पाती । पहुँचना मुश्किल था लेकिन पचमढ़ी राष्ट्रीय उद्यान से दूरबीन द्वारा धूपगढ़ व चौरागढ़ के दर्शन का आनंद भी रोमाचंक रहा । दूरबीन एडजस्ट करते हुए इन स्थलों के बारे में बताती स्थानीय महिला की कार्यशैली महिला सशक्तिकरण की कहानी बयान करती सी प्रतीत हुई । धूपगढ़ का वहीं कच्चा चित्र जो मेरी नोटबुक में बना था , मैं दूरबीन के सहारे देख पा रही थी , मध्यप्रदेश की सबसे ऊँची चोटी जो सूर्यास्त के मनोहारी दृश्य के लिए प्रसिद्ध है ।
यहीं से दूरबीन द्वारा हमने चौरागढ़ मंदिर का दर्शन भी हुआ , मंदिर व उसके आस पास बडे़ -बडे़ त्रिशूल ! हजारों की संख्या में त्रिशूल । दूरबीन वाली गाइड बहन ने बताया ,मनोकामना पूर्ति पर श्रद्धालू यहाँ त्रिशूल चढ़ाते हैं । 1300 पक्की सीढियों से उच्च शिखर तक पहुँच कर चौरागढ़ महादेव का दर्शन करने का मार्ग कठिन है । सबसे अंतिम चढ़ाई सबसे कठिन व खड़ी चढ़ाई है । धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस स्थान को दूरबीन द्वारा देख कर दूर से प्रणाम कर हम अपने अगले गंतव्य की ओर मुड़े ।
जटाशंकर शिव तीर्थ को भगवान शिव की तपस्थली माना जाता है । लोक-मान्यता के अनुसार, जटाशंकर में तप करने के बाद भगवान शिव चौरागढ़ शिखर पर विराजमान हुए । यहाँ की चट्टानें जटाओं की भाँति दिखती हैं । इन गुफाओं में प्राकृतिक शिवलिंग ,गुफाओं की दीवारों से झरते जल द्वारा शिवाभिषेक व विशाल चट्टानों का नाग के आकार में होना अंचभित करता है। यदि गाइड ने न बताया होता तो चट्टानों में विशाल नाग की आकृति को देख पाना संभव न होता । पचमढ़ी की घाटी में स्थित इस शिव गुहा तक पहुँचकर मानो महादेव का आशीर्वाद मिल गया । तप और साधना की यह स्थली ,जैवविविधता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है । पचमढ़ी वन्य परिसर औषधीय वनस्पत्तियों का खज़ाना है । जटाशंकर मार्ग में लगभग फुटबॉल के आकार के जंगली प्याज , नाशपाति से दिखने वाले नींबू , मधुमेह व अन्य बिमारियों के लिए रामबाण इलाज हेतु दुर्लभ जड़ी बूटी बेचनेवाले दिखे । हमे कोई खरीदारी नहीं करनी थी , फिर भी हमने दर्दनाशक तेल , गार्लिक आइल (लहसून तेल की सूंघनी ) जैसी कितनी ही दवाईयाँ खरीद ली । स्थानीय लोगो के रोजगार व मुनाफे से जोड़ते हुए हम अपनी सारी खरीदारी को सही ठहराते हुए कार में बैठ गए ।
हम सबके दिल की धड़कने बढ़ने लगी थी, अंधेरा अब गहराने लगा था । सुरक्षित और सही समय पर पिपरिया पहुँचना अब हमारी प्राथमिकता थी । महानगरीय सभ्यता में पले- बढ़े लोग ,जंगल के नियमों का अंदाजा नहीं लगा पाते । दूर - दूर तक बिना स्ट्रीट लाइट के घुमावदार रास्तों पर वाहनों के चलते समय महादेव याद आने लगे। रास्ते में जैसे ही रेस्टारेंट दिखा , हमने झटपट डिनर के लिए पार्सल पैक करवाया , पार्सल की पैकिंग होने तक चाय की चुस्की ने थोड़ी राहत दी । हमारी कार पिपरिया स्टेशन के लिए गति पकड़ने लगी।
हम अपेक्षित समय से पहले ही स्टेशन पहुँच गए। स्टेशन का प्लेटफार्म व वेटिंग रूम नेशनल ट्रेनिंग सेंटर के प्रशिक्षणार्थियों से भरा पड़ा था । हम वर्दी में नहीं थे लेकिन हम स्काउट्स व गाइड्स हैं , हमारी इस पहचान ने स्टेशन परिसर में हम सबको एक ही समूह का हिस्सा महसूस कराया ।
भारत के हृदय ,मध्य प्रदेश में स्थित पचमढ़ी के प्राकृतिक सौंदर्य को महसूस नहीं किया , पचमढ़ी की परिक्रमा नहीं की तो आप माँ भारती के दर्शन का अवसर चूक जायेंगे।
पचमढ़ी को प्रणाम !
पचमढ़ी परिसर के शिवत्व को प्रणाम !
सुमन शर्मा

Comments