दिल ए अजीज़ बनू ,जब ये कोशिशें नाकाम हुई ,
नाकामी इस कदर रोई ,सरेआम वह बदनाम हुई ।
तस्वीर - ए बटुए ! अश्कों को संभालें कैसे ?
जिसे था नाज खुद पर , खाक- ए सैलाब हुई ।
जो मिले तुझको मेरी उदासी का सबब ,
बताना मुझको , मै क्यो नहीं मुस्कान हुई ?
हक न इश्क का ,न अश्क का हासिल जो मुझे ,
रश्क भी छूटा , अब मैं भी खुशमिजाज हुई ।
अजीज़ बन गई खुद की , तो न खुदगर्ज कहना ,
मोहब्बत खुद से ही हर दवा ए मर्ज हुई ।
खुशबू फैली हवा में , बाग गुलजार हुआ ,
एतबार खुद पर जरूरी है, सुमन जान गई ।
सुमन शर्मा
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